मनीभाई नवरत्न

यह काव्य रचना छत्तीसगढ़ के महासमुंद जिले के बसना ब्लाक क्षेत्र के मनीभाई नवरत्न द्वारा रचित है। अभी आप कई ब्लॉग पर लेखन कर रहे हैं। आप कविता बहार के संस्थापक और संचालक भी है । अभी आप कविता बहार पब्लिकेशन में संपादन और पृष्ठीय साजसज्जा का दायित्व भी निभा रहे हैं । हाइकु मञ्जूषा, हाइकु की सुगंध ,छत्तीसगढ़ सम्पूर्ण दर्शन , चारू चिन्मय चोका आदि पुस्तकों में रचना प्रकाशित हो चुकी हैं।

उपभोग का पहाड़ – मनीभाई नवरत्न

प्रकृति और पर्यावरण

🛍️ उपभोग का पहाड़ 🛍️ वे बाज़ार जाते हैंबस एक कपड़ा लेने,पर लौटते हैं —थैले से लदे,मन से खाली। आवश्यकता दरवाज़े पर रह जाती है,लालच भीतर कुर्सी पर बैठ जाता है।“सेल चल रही है”,“एक खरीदो एक मुफ़्त पाओ” —ये जादू के शब्द हैं,जो मनुष्य को वस्तु बना देते हैं। दुकानों में अब वस्त्र नहीं,स्वप्न टंगे

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फैशन के दौर पर इच्छा की गारंटी ना करें -मनीभाई नवरत्न

हिंदी कविता

👗 फैशन के दौर पर इच्छा की गारंटी ना करें 👠 फैशन बदलते हैं —मौसम की तरह,रंगों की तरह,रुचियों की तरह। आज जो नया है,कल वही पुराना हो जाएगा।आज जो आकर्षक लगता है,कल वही अलमारी में पड़ेगा,भूल गया, बेकार। इच्छाएँ भी ऐसी ही होती हैं —फैशन की तरह अस्थायी,क्षणिक, चमकीली,पर भीतर से रिक्त। हर नया

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“धर्मनिरपेक्ष संविधान, धार्मिक भीड़” – मनीभाई नवरत्न

हिंदी कविता

“धर्मनिरपेक्ष संविधान, धार्मिक भीड़” (एक सवाल की शक्ल में कविता) हमने क़सम खाई थीइक धरती की,जहाँ मज़हब से ऊपर होगी इंसानियत।पर मंदिर-मस्जिद की दीवारों ने ,सोचा नहीं थाघुटती संविधान की आहट? संविधान पे तो लिखा है —“सब धर्म समान”,पर ज़ुबानों पे क्योंनफ़रत के बयान?राज सत्ता हो निष्पक्ष,अगर यही है बात,पर जनता खुद बँटी हो,क्या फिर

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“एक ही चेहरा” — मनीभाई नवरत्न

समाज और यथार्थ

🌓 “एक ही चेहरा” — मनीभाई नवरत्न विश्वास —एक नज़र है,जो देखना नहीं चाहती,सुनना भी नहीं,जो अपने भीतर के मौन कोईश्वर का उत्तर समझ बैठती है। जब तू हाथ जोड़ता है,तो ईश्वर मुस्कुराता है —पर जब तू सवाल छोड़ देता है,तो वही मुस्कानडर में बदल जाती है। धार में बहा दिया गया नारियल,पूजा की थाली,एक

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भूख का शास्त्र- मनीभाई नवरत्न

प्रकृति और पर्यावरण

“भूख का शास्त्र” भूखा आदमीविचार नहीं करता,वह रोटी की आकृति में ईश्वर देखता है।जो टुकड़ा फेंक दे —वही उसका भगवान बन जाता है। भूख, आदर्शों की अंतिम परीक्षा है,जहाँ नीति किताबों में रह जाती हैऔर पेट—धर्मग्रंथ बन जाता है। चापलूसी कोई गुण नहीं,पर भूख उसे भी सिखा देती है“जी हजूर” के मीठे उच्चारण,“सत्य” से कहीं

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शराब पीना आत्महत्या क्यों है? |भूलना चाहता हूँ कि मैं जी रहा हूँ- मनीभाई नवरत्न

हिंदी कविता

यह अतुकांत हिंदी कविता “धीरे-धीरे मरना” शराब की लत से आत्मविनाश की दर्दभरी यात्रा को दर्शाती है। पढ़िए — कैसे हर पैग एक इंसान के सपनों और उम्मीदों को धीरे-धीरे खत्म करता जाता है। भूलना चाहता हूँ कि मैं जी रहा हूँ।” (अतुकांत कविता) रात की खामोशी मेंवह बोतल से बातें करता है,जैसे किसी पुराने

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ईश्वर का सौदा – मनीभाई नवरत्न की व्यंग्यात्मक कविता

समाज और यथार्थ

मनीभाई नवरत्न की कविता “ईश्वर का सौदा” समाज पर व्यंग्य करती है कि कैसे इंसान ने ईश्वर को राजनीति, जात-पांत और व्यापार का साधन बना दिया है। पढ़ें यह विचारोत्तेजक रचना। ईश्वर अनंत, शाश्वत और सर्वव्यापी है। लेकिन समय के साथ इंसान ने अपनी स्वार्थपूर्ण सोच और आडंबरों में उसे बांधकर छोटा कर दिया है।

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ईश्वर का अपमान – मनीभाई नवरत्न की विचारोत्तेजक कविता

समाज और यथार्थ

मनीभाई नवरत्न की कविता “ईश्वर का अपमान” में बताया गया है कि इंसान ने ईश्वर की महानता को सीमित कर दिया है। पढ़ें यह विचारोत्तेजक रचना जो समाज की सोच पर गहरा प्रहार करती है।ईश्वर सर्वव्यापी है, उसे किसी मंदिर या पूजा की सीमाओं में बाँधना संभव नहीं। कवि मनीभाई नवरत्न अपनी कविता “ईश्वर का

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धूल का पांडुलिपि: मनीभाई नवरत्न की मार्मिक कविता | भावनात्मक हिंदी कविता

समाज और यथार्थ

मनीभाई नवरत्न की कविता “धूल का पांडुलिपि” एक लेखक की अनकही कहानी बयान करती है, जो समाज की सच्चाई को शब्दों में पिरोती है। पढ़ें यह भावनात्मक और विचारोत्तेजक रचना। कविता का उद्देश्य “धूल का पांडुलिपि” कविता का उद्देश्य समाज में व्याप्त असमानता, उपेक्षा और मानवीय संवेदनाओं की अनदेखी को उजागर करना है। यह एक

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मैं कौन? मनीभाई नवरत्न की आत्मचिंतन से भरी दार्शनिक हिंदी कविता

समाज और यथार्थ

मनीभाई नवरत्न की कविता “मैं कौन?” आत्म-पहचान और जीवन के गहन सवालों को उजागर करती है। यह दार्शनिक रचना आपको स्वयं की खोज और शून्यता के सत्य की ओर ले जाती है। कविता का उद्देश्य “मैं कौन?” एक गहन दार्शनिक कविता है जो मानव जीवन में आत्म-पहचान के प्रश्न को आध्यात्मिक और चिंतनशील दृष्टिकोण से

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दीपोत्सव का आत्मप्रकाश

समाज और यथार्थ

दीपोत्सव का आत्मप्रकाश(एक आध्यात्मिक कविता) हर वर्ष आता दीप पर्व, लाता रोशनी का संदेश,पर क्या जलाया अंतर्मन, या फिर दीप विशेष?भीतर झांको, पूछो खुद से, क्या बढ़ा है ज्ञान?या अब भी छाया है भीतर, अज्ञान का संधान? निरंतर आत्म-मूल्यांकन, यही है सच्ची दीवाली,हर क्षण खुद को देखो तुम, ना हो आंतरिक खाली।बाहर की चकाचौंध व्यर्थ

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ब्रह्मचर्य का सत्य: मनीभाई नवरत्न की आध्यात्मिक हिंदी कविता | गहन दार्शनिक रचना

समाज और यथार्थ

मनीभाई नवरत्न की कविता “ब्रह्मचर्य का सत्य” आत्म-संयम और आध्यात्मिक जागृति की गहन खोज करती है। पढ़ें यह प्रेरक और दार्शनिक रचना जो आत्मा की शुद्धता और सत्य की ओर ले जाती है।

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