दीपावली पर कविता (Poem on Diwali in Hindi)

दिवाली / दीपावली पर कविता (Poem on Diwali in Hindi) : भगवान श्रीराम जब लंका के राजा रावण का वध कर पत्नी सीता और भाई लक्ष्मण के साथ अयोध्या वापस लौटे तो उस दिन पूरी अयोध्या नगरी दीपों से जगमगा रही थी. भगवान राम के 14 वर्षों के वनवास के बाद अयोध्या आगमन पर दिवाली मनाई गई थी. हर नगर हर गांव में दीपक जलाए गए थे. तब से लेकर आज तक दीपावली का त्यौहार मनाया जाता है. और इसी पर आधारित ये कुछ कविताएँ –

Poem on Diwali in Hindi

दीपावली पर्व विशेष कविता Poem on Diwali

दीप वंदन

दीप वंदन कर सकें हम,भाव ऐसा ईश देना।
नम्रता से प्रेम-पद में झुक सके वो शीश देना।।

षड्विकारों के तमस से पंथ जीवन का घिरा है।
ज्योति का आशीष उज्ज्वल कर कृपा जगदीश देना ।।

जल उठे सद्भावना का दीप हर्षित हो हृदय में।
विश्व को वाणी विमल वात्सल्य से वागीश देना।।

भूल होती है सभी से चूक के पुतले सभी हम।
पतित भी पावन बने वो दंड न्यायाधीश देना।।

अवनि आलोकित सदा आलोक हो आत्मीयता का।
एक शुभकर दीप पावन बाल हे ज्योतीश देना।।
R.R.Sahu

अपनी दीवाली आई है

कार्तिक मास की सर्द ऋतु में
देखो  दीपावली आई है ।
जगमगा उठी अपनी वसुंधरा 
चहुँओर खुशीहाली छाई है ।
सुख समृद्धि भरकर दीपोत्सव
अपनी थाली में लाई है ।


अंधकार भगा प्रकाश को लेकर
अपनी दीवाली आई है ।।


साफ-सुथरा हर गली मुहल्ला 
कितना प्यारा लगता है   ।
सजा-धजा अपना स्वदेश 
जो जग से न्यारा लगता है ।
अधर्म मिटाकर धर्म के रथ पर
चढ़कर दीपावली आई है ।


अंधकार भगा प्रकाश को लेकर
अपनी दीवाली आई है।।


हल्के पीले रंग गुलाबी
दीपों के मनमोहक रंग ।
बच्चे फोड़ते खूब पटाखे
हँसी खुशी हर ओर उमंग ।
भाईचारा का संदेश देती हुई
फिर से दीपोत्सव आई है ।


अंधकार भगा प्रकाश को लेकर
अपनी दीवाली आई है।।


धानी चादर ओढे उर्वी 
गुलाबी ठंडक बरसाती है ।
दीपों से सज रही है धरणी
सबके मन को हरसाती है ।
सब धर्मो के गूढ तत्व को
अपने प्रकाश में समाई है ।


अंधकार भगा प्रकाश को लेकर
अपनी दीवाली आई है।।


घी के दीपक जगमग जलते
श्रीराम कृष्ण के स्वागत में ।
श्रेष्ठ सभ्यता मिलीं है हमको
गीता रामायण के समागत में।
सामाजिक समरसता को लेकर
पावन दीपोत्सव आई है ।


अंधकार भगा प्रकाश को लेकर।
अपनी दीवाली आई है।।


बाँके बिहारी बरबीगहीया

दीपावली का आया त्यौहार

दीपावली का ,आया त्यौहार,
झूमे नाचे ,सब नर नार।
माँ लक्ष्मी की ,अर्चना से,
भर जाते ,धन के भंडार।

खील बतासे ,बर्फी लड्डु,
भरते मन में ,उमंग मिठास।
कोना कोना ,निखरे ऐसे,
जैसे धवल ,चांदनी रात।

महल झोंपड़े चमक गए सब,
दीपक सजे लंबी कतार।
धरती पर ही लग गए है,
मानों सुन्दर ,स्वर्ग बाजार।

सफल तभी ,होगा त्यौहार,
ग़रीब का भी ,भर जाए थाल।
हर इक हाथ बढ़ जाए मदद का,
मिट जाए उनका अंधकार।

रजनी श्री बेदी
जयपुर
राजस्थान

दीवाली आई

जोश उमंग घर आँगन छाए,
प्रकाश पर्व दीवाली आई ।
अंधकार अंतस का हरने,
 दीपों की रोशनी लाई ।

माटी के दीप जले घर आंगन,
रंगोली भी छटा बिखराए।
लक्ष्मी गणेश अर्चन वंदन 
प्रभु श्रीराम मंदिर में सजाए।

जलते दीपों के प्रकाश में,
जीवन तिमिर दूर भगाएँ ।
राग द्वेष को छोड़ दें हम,
मन से मन का दीप जलाएँ।

अब की बार दीवाली हम,
नए भाव के साथ मनाएँ।
बैर,नफ़रत को भुलाकर,
खुशियों से जग महकाएँ।

तमस दूर हो मन से हमारे,
स्वार्थ लोभ अहं मिटाएँ ।
अपनों को ही नहीं साथियों,
दुश्मन को भी गले लगाएँ।

झिलमिल दीप अवलि सी ,
जग को जगमग कर जाएँ ।
रूठे हैं जो सुजन हमसे ,
प्रेम मनुहार से उन्हें मनाएँ ।

अभिमान विनाश का मूल है,
इस आग में न जल पाएँ।
ज्ञानी रावण भी खाक हुआ,
संदेश धरा पर यह फैलाएँ ।

दीपोत्सव का पावन प्रकाश,
यत्र तत्र सर्वत्र फैलाएँ ।
प्रदूषण मुक्त रहे धरा,
आतिशबाजी नहीं जलाएँ।

मन वीणा झंकृत हो उठे,
जीवन सुखी स्वस्थ बनाएँ ।
पर्यावरण संरक्षण में हम ,
सक्रिय हो भूमिका निभाएँ ।

कुसुम लता पुंडोरा
नई दिल्ली

दीवाली के प्रेरक कविता

Poem on Diwali in Hindi

एक दीप जलाएं उनके नाम

लड़ियां
दीपों की ,
जले चारो ओर ,
आज हुई जगमग ,
रोशन दिवाली ।

चहुँओर चेहरों पर
जलते दीपों सी जगमग ,
चहुंओर देखो
खुशचेहरों की खुशहाली ।

मांवस रात भी ,
लगे पूनम चमकती
काली है फिर भी,
लगे भरपूर उजियाली।

पर जिनसे यहाँ पर है,
हर घर में उजली रौनक,
उनका घर ,
क्यों आज लगता ,
दुनियां की खुशियों से
एकदम ही खाली..??

परिवार से दूर ,
वो बैठ सरहद पर ,
बन्दूक लिए हाथ ,
है आज भी मुस्तेद ,
करते हैं वो सब ,
भारत माँ की रखवाली ।

कृतज्ञ बने ,
उनके प्रति आज,
उनको याद करके हम ,
सो गये जो जाकर ,
करके ,
माँ की गोद खाली ।

नमन करें हम ,
उन महान
वीर शहीदों को,
जिनके घर आज हुई,
सूनी और केवल
अंधियारी दीवाली।

चलो ,
एक दीप जलाएं ,
उनके लिए खुशियों का,
कर उनके नाम अर्पण ,
देकर दुवाएं ,
मिले सौगाते खुशियों की ,
हर रात बने उनकी भी ,
खुश जगमग दिवाली।

तब ही हो भारत का,
हर घर-घर सुरक्षित ,
दीपों की जगमग से बढ़ ,
होगी ‘ अजस्र ‘ खुशियों से
रोशन और चमकती दिवाली ।

डी कुमार अजस्र (दुर्गेश मेघवाल,बून्दी/राज.)

तब होगी सच्ची दीपावली

तब होगी सच्ची दीपावली

कुछ फूलों के खिलने से।
दिल में प्रेम के पलने से।
तब सच्ची है ये दीपावली।
मन में दीयों के जलने से।1।

चिरागों के यूँ जलने पर।
यश सुख वैभव हो हर घर।
तब सच्ची है ये दीपावली।
जब रौनक हो हर गांव शहर।2।

मासूम बच्चों के चेहरे में।
खिलखिलाती बंद शेहरे में।
तब सच्ची है ये दीपावली।
खुश हो बचपन गर पहरे में।3।

जन जन की सेवा सम्मान करें।
गरीबों के चेहरे में मुस्कान भरें।
तब होगी सच्ची ये दीपावली।
दुखियों के दुख हर खुश करें।4।

गर ना हो सुख भैभव व विलास।
पर हो आदमी से आदमी को आस।
तब होगी सच्ची ये दीपावली।
जब मन में हो पूरा विश्वास।5।

न सोने चांदी गहनों की सौगात हो।
न धन धान्य भैभव की बरसात हो।
तब होगी सच्ची ये दीपावली जब।
किसी के जीवन में न काली रात हो।6।

सुन्दर लाल डडसेना”मधुर”
ग्राम-बाराडोली(बालसमुंद),पो.-पाटसेन्द्री
तह.-सरायपाली,जिला-महासमुंद(छ. ग.) पिन- 493558

दिवाली को मनाएँ हम

चलो इस बार फिर मिल कर, दिवाली को मनाएँ हम।
हमारा देश हो रोशन, दिये घर-घर जलाएँ हम।

मिटायें सर्व तम जो भी, दिलों में है भरा कब से।
करें उज्ज्वल विचारों को, खुरच कर कालिमा मन से।
भरें नव तेल नव बाती, जगे उत्साह तन मन में।
जतन से दूर कर लें हम, उदासी सर्व जीवन से।
चलो घर द्वार को मिल कर, दिवाली पर सजाएँ हम।1
चलो इस बार फिर मिल कर…..

छिपा मन में कहीं जो मैल, रिश्तों में लगे जाले।
करें अब दूर वो मतभेद, देते पीर बन छाले।
लगायें प्रेम का मलहम, विलग नाते पुनः जोड़ें।
लगा कर प्रेम की चाभी, दिलों के खोल दें ताले।
जला कर नेह का दीपक, तिमिर मन का भगायें हम।2
चलो इस बार फिर मिल कर…..

न छूटे एक भी कोना, नहीं कुछ भी अँधेरों में।
उजाले हाथ भर-भर कर, चलो बाँटें बसेरों में।
गरीबों को मिले भोजन, करें घर उनके भी रोशन।
चलो मिल बाँट दे खुशियाँ, दिखें सब को सवेरों में।
उघाड़ें स्याह परतों को, पुनः उजला बनायें हम।3
चलो इस बार फिर मिल कर…..
करें हम याद रघुवर को, किया वध था दशानन का।
लखन सीता सहित प्रभु ने, किया था वास कानन का।
बरस पूरे हुए चौदह, अवध में राम जब लौटे।
दिवाली पर करें स्वागत, रमा के सँग गजानन का।
उसी उपलक्ष्य में तब से, दिवाली को मनाएँ हम।4
चलो इस बार फिर मिल कर…..

चलो फिर आज खुश होकर, दिवाली को मनाएँ हम।
हमारा देश हो रोशन, दिये घर-घर जलाएँ हम।

प्रवीण त्रिपाठी, नोएडा, 27 अक्टूबर 2019

दीपावली में एकता का सन्देश

शुभ दिन आज दीपोत्सव आया
अपने संग खुशी उमंग को लाया।
सजा-धजा हर घर का कोना
रंग-बिरंगी खुशियाँ है लाया।
आपसी बैर कटुता को मिटाकर
मिलजुल कर रहने को सिखाया।


सत्य,धर्म,तप,त्याग के बल पर
प्रभु का पर्व विजयोत्सव आया।
हँसी,खुशी सौहार्द को लेकर
पावन पर्व दीपोत्सव आया ।

रंगकर प्रेम के रंग मे मानव
एक दूजे को गले लगाया ।
भाव में भरकर हर कोई साथी
प्रेम भरा एक दीप जलाया।
बच्चे भी आनंद में डूबकर
स्नेह सागर में हमें डूबाया।


प्रभु ने भी खुशियों में रमकर
प्रेम सुधा रस खूब बरसाया ।
हँसी खुशी सौहार्द को लेकर
पावन पर्व दीपोत्सव आया।

रावन संहार प्रभु आये अयोध्या
बाजी बधाई मन हरसाया।
नाचो गाओ सब खुशी मनाओ
बरसों बाद ये शुभ दिन आया।
घी के दीपक घर-घर जलते
अंधकार भागा उजियारा छाया।


महालक्ष्मी के शुभ आगमन से
लोग आपसी द्वेष भूलाया ।
हँसी खुशी सौहार्द को लेकर
पावन पर्व दीपोत्सव आया ।।

बाँके बिहारी बरबीगहीया

पाँच दिवसीय पर्व दीपावली

दीपक

धन की वर्षा हुई बाजारों में ,
चेहरों पर खुशियों की लड़ियाँ जगमगाई।

धन से धन्य दिन-रात हुए जगमग,
धन तेरस ने शुरुआत करवाई ।

कुबेर ने घर आंगन खोला खजाना ,
धन-धान्य खुशियों की घर-घर लहराई ।

धन की वर्षा अभी थमी नहीँ थी ,
सज-श्रृंगार निखारने रूप-चतुर्दशी आई ।

नायिका संग-संग नायक भी सज गए ,
सजने-सजाने की वो कैसी चतुराई !

रूप-चतुर्दशी भी जब आ और निकल गई ,
घर आँगन को जन-जन बहुविध सजवाई ।

दीपों की लड़िया अब चहुँ ओर जगमग ,
जब मन हर्षाती दीपावली आई ।।

शुभ और लाभ को संग-संग लेकर ,
गणेश-सरस्वती संग, महालक्ष्मी माई ।

खुशियां सभी मिल जाये जग-जन को
यही दुआ बस हम करते है भाई ।।

बीत गया जब दिवस दीप तब ,
पूजन गोवर्धन की तयारी करवाई ।

गांव-गांव में पूज के गौ-वंश ,
कृषक-भाई संग गौमाता पूजवाई।

दीप दिवस मना लिया पिया- घर ,
लौट के दुल्हन अब पीहर आई ।

ससुराल से लेकर सास-ससुर दुआएं,
दिखी दुल्हन मन ही मन हर्षाई ।

पहुंच के पीहर ,लग मात-पिता हिय ,
बेटी को बचपन की यादें याद आई ।

भाई बसा हिय दौज दिवस तब,
कर के तिलक हर ली सब बलाई।

पांच दिवस का मना के दीप-उत्सव
देखो ये दुनियां लगे जगमगाई ।

अगले बरस की बाट निहारण को,
‘ अजस्र ‘ संग, सब चलते है भाई ।

बरसों बरस यों आती रहें खुशियां,
दुनियां रहे यूँ ही सदा हुलसाई ।

हर घर में जले खुशियों के दीपक ,
हर घर बाजे घन, सुरमयी शहनाई ।

डी कुमार–अजस्र(दुर्गेश मेघवाल,बून्दी/राज.

बैल- दीवाली

बैल- दीवाली , बिन बैल है खाली ,

आओ मनाएं हम सूनी दीवाली ।

कोना भी सूना है ,आँगन भी रूना है ,

माँ और बेटे की हर बात है खाली ।

कृषक-भाई (बैल ) ठोकर ही खाए है,

कृषक के लिये है कहाँ खुशहाली ।

कम कहीँ नहीँ था ,कमजोर नहीँ था ,

मशीन की तुलना में था बलशाली ।

पर भाई को जान ,इक निरा जानवर ,

किया किसान ने उसे बदहाली ।

कमाई से जिसकी ये भारत पला था ,

आज है बस उसकी कटवाली।

बेटा ही जब कत्लखाने चढ़ा हो ,

करे कौन अब गौमाता रखवाली ।

पुरातन को खोकर नए को है पाला,

उन्नति की चाल अजब मतवाली ।

सौ से घट कर अब साठ रह गयी ,(औसत उम्र)

अब भी कहते हो मशीन निराली ।

खोजो ढूंढो अनुसन्धान करो तुम ,

जो है उसको अब कैसे सम्भाली ।

कृषक फिर से कृष् ही न बन जाए ,

आत्महत्या का वो बने सवाली ।

समय अब भी है संभलो-संभालो ,

‘अजस्र’ दीपावली न हो फिर काली ।

*डी कुमार–अजस्र(दुर्गेश मेघवाल,बून्दी/राज)*

जगमग दीप जले घर-घर में

जगमग दीप जले घर-घर में,
                लेकर खुशियाँ आयी है।
रंग-बिरंगी    परिधानों   में,
                सबके मन को भायी है।।
                
धनतेरस  की  पावन   बेला,
                खुशहाली घर आते हैं।
स्वस्थ होत हैं तन मन जिससे,
                धन्वन्तरी  बताते   हैं।।
लेकर के सौगातें देखो,                
                 शुभ दीवाली आयी है।
जगमग दीप जले घर-घर में,
                 सबके मन को भायी है।।

नरकासुर  राक्षस  को  मारे,
                 इस दिन श्री बनवारी थे।
लौटे रावण मार अवध को,
                 राम विष्णु अवतारी थे।।
स्वागत दीप जलाते दिल से,
                 खुशियाँ मन में छायी है।
जगमग दीप जले घर-घर में,
                 सबके मन को भायी है।

माता लक्ष्मी और गजानन,
                वांछित  वर  दे  जाते हैं।
खील बताशे भोग आरती,
                पूजन शुभ फल पाते हैं।।
घर आँगन में खुशियाँ देखो,
                 सबके मन में छायी है।।
जगमग दीप जले घर-घर में,
                 सबके मन को भायी है।

रचनाकार:-
बोधन राम निषादराज “विनायक”
सहसपुर लोहारा,जिला-कबीरधाम(छ.ग.)

प्रति दिवस दीपावली

एक-एक कई दीप जलाकर,
दीपावली हमने मनाई ।

अगणित दीप हृदय में जल गए,
खुशियां मन में हर्षाई।

मन-आंगन कई दीप जले थे,
अंधियारा ठहर न पाया था ।

काफी दिनों में दीन भी उस दिन,
बाद वर्ष , मन से हर्षाया था ।

‘अवध’ दीपों की कीर्ति बनाकर,
दुनियां में इठलाता है ।

एक दिवस जो हुआ उजाला,
क्यों.. शेष बरस तरसाता है..??

शुभकामनाएं, मिठाई-बधाई,
उस दिन ढेरों-ढेर असीम।

दिवस गुजर गया ,दीपक बुझ गया ,
बाकी रह गई मन में सीम(नमी)।

तेल नहीं है या, दीप है टूटा,
क्यों अंधियारा बलशाली …??

एक दिवस जब सब जग-जगमग ,
बन सकती प्रति-दिवस दीपावली।

प्रयास अथक हो ,ईमान से समृद्ध ,
दीन की न हो, कोई रात फिर काली।

मिलकर आओ,संग *अजस्र* मनाएं ,
हम-तुम वो प्रति- दिवस दीपावली।

✍✍ *डी कुमार–अजस्र(दुर्गेश मेघवाल,बून्दी/राज.)*

अयोध्या की दीपावली

दिपावली का इतिहास रामायण से भी जुड़ा हुआ है, ऐसा माना जाता है कि श्री राम चन्द्र जी ने माता सीता को रावण की कैद से छुड़ाया तथा उनकी अग्नि परीक्षा के उपरान्त, 14 वर्ष का वनवास व्यतीत कर अयोध्या वापस लोटे थे। अयोध्या वासियों ने श्री राम चन्द्र जी, माता सीता, तथा अनुज लक्षमण के स्वागत हेतु सम्पूर्ण अयोध्या को दीप जलाकर रोशन किया था, तभी से दीपावली अर्थात दीपों का त्यौहार मनाया जाता है। लेकिन आपको यह जानकर बहुत हैरानी होगी की अयोध्या में केवल 2 वर्ष ही दिपावली मनायी गई थी।

Poem on Diwali in Hindi

चौदह वर्षों बाद
हो रहा आगमन
राम लक्ष्मण संग
जानकी का होगा अभिनंदन

सज रही अनुपम
अयोध्या नगरी
जैसे सजती कोई
अप्सरा सुंदरी

भव्य साज-सज्जा
रंग रोगन से परिपूर्ण
फीकी पड़ी इंद्रपुरी अमरावती
अयोध्या हुई अर्थ पूर्ण

अंदर बाहर और
आंगन सहित द्वार पर
बना दी बालाओं ने
रंगोलियां शुभ अवसर पर

कार्तिक मास है
रात्रि अमावस्या की
घड़ी समाप्त हो रही
वर्षों की तपस्या की

सुदूर आकाश मार्ग से
उतरा पुष्पक विमान
धन्य धन्य हुई अयोध्या नगरी
पधारे हैं भगवान

दर्शन की अभिलाषा में
बिछे हैं नयन
हाथ में पुष्प थाल
मन में श्रद्धा सुमन

घर-द्वार आंगन
कुटिया महल अट्टालिकाएं
झिलमिल झिलमिल जगमग जगमग
अयोध्यावासी घी के दीप जलाएं

दीप की लड़ियां चहुओर
संदेश अंधकार से प्रकाश की ओर
दीपावली पर्व मनाते तभी से
प्रतिवर्ष श्रद्धा भक्ति से हो भाव विभोर

-आशीष कुमार

घर-घर दीप जले

अवध पुरी आए सिय रामा।
 ढोल बजे नाचे सब ग्रामा।। 
 घर-घर दीप जले हर द्वारे। 
 वापस आए सबके प्यारे।।

 राम राज चहुँ दिशि है व्यापे। 
 लोक लाज संयत सब ताके ।।
 राजधर्म सिय वन प्रस्थाना ।
 सत्य ज्ञान किंतु नहीं माना।।

 है अंतस सदा बसी सीता ।
 एकांत रहे उर बिन मीता।।
 सुख त्याग सर्व कर्म निभावें।
 प्रजा सुखी निज दुख बिसरावें।।

नरकासुर मारे बनवारी ।
राम तो है विष्णु अवतारी ।।
खील बताशे अरू आरती।
 सबके मन खुशियाँ भर आती।।

 सज रही देख दीप मालिका।
 खुश हैं बालक सभी बालिका ।।
 उर आनंदित चहुँ दिशि छाये। 
 हरे तिमिर जगमग छवि पाये ।।

लिपे -पुते सुंदर घर द्वारे।
 हैं प्रकाशित रहे उजियारे।।
 नए-नए सुंदर परिधाना।
 सब को मन से तुम अपनाना।। 

अर्चना पाठक ‘निरंतर’
अम्बिकापुर ,सरगुजा 
छत्तीसगढ़

ज्ञान का दीप जलायें

वनवास कटा,
प्रभु आये घर को,
स्वर्ग से सुंदर धरा सजी।
दुल्हन बन चहके वसुधा,
हरियाली सर्वत्र बिछी।

पुलकित हो गयी धरती माँ भी,
धन-धान्य से उसकी गोद भरी।
नव धान्य,नव फसलें आयी,
माता लक्ष्मी भी हरसाई।

हर घर मंगल गीत बजे हैं,
द्वार-द्वार रंगोली सजी।
घर-घर बाजे ढोल और ताशे,
बाँट रहे सब खील-बताशे।

अमावस की कालरात्रि में,
घर-घर दीप जलाए।
दीपशिखा सी चमके रजनी,
जग जगमग हो जाए।

कार्तिक की ये रात अमावस,
पूनम से भी दीप्त लगे।
चलो,तुम्हें मिलवाऊँ उनसे,
जिनकी दीवाली रिक्त लगे।

नन्हे-नन्हे हाथों ने,
कुछ दीये बनाये मिट्टी के।
उम्मीदों के रंगों से फिर,
दीये सजाए मिट्टी के।

आधुनिकता की चकाचौंध में,
भूल गया इंसान।
मिट्टी के ही दीये जलाना,
परम्परागत शान।

मिट्टी के यदि दीये जलायें,
दो घर रौशन हो जाते है।
एक घर जिसमे दीये बने हों,
दूजा हम जो घर लाते हैं।

दीवाली इक प्रकाश पर्व है,
हर घर रौशन हो जिसमें।
इक आँगन भी सुना हो तो,
बोलो क्या है बड़ाई इसमें।

आज चलो,संकल्प करें हम,
हर घर रौशन करना है।
कुछ मिट्टी के दीये जलाकर,
हर आँगन में धरना है।

इसी तरह आओ सब मिलकर,
ज्ञान का दीप जलायें।
अज्ञानता का तिमिर घटे,
कुछ सीखें,और सिखायें।
~~~

विजिया गुप्ता “समिधा”
दुर्ग-छत्तीसगढ़

दीपावली पर गज़ल

दीपावली शरदृतु में प्रतिवर्ष मनाया जाने वाला एक पौराणिक सनातन उत्सव है। यह कार्तिक मास की अमावस्या को मनाया जाता है और भारत के सबसे बड़े और सर्वाधिक महत्वपूर्ण त्योहारों में से एक है। आध्यात्मिक रूप से यह ‘अन्धकार पर प्रकाश की विजय’ को दर्शाता है।

Poem on Diwali in Hindi

रात भर मंज़ूर जलना, जोत ने जतला दिया
दूर करके हर अँधेरा दीप ने दिखला दिया

घिर गया था हर तरफ़ से, रात काली थी बहुत 
चाँद ने हँस कर मुझे पर रास्ता बतला दिया। 

आग की बहती नदी को पार करना था कठिन
चुप्पियों ने ज़िंदगी का हर हुनर सिखला दिया। 

बिन किये कोई ख़ता मुझको मिली हर पल सजा
आँसुओं ने इसलिये चुपचाप फिर नहला दिया। 

बेबसी का था कफ़स थीं धर्म की भी बेड़ियाँ
इसलिये तूने हँसी में सच ‘अमर’ झुठला दिया। 

अमर पंकज
(डाॅ अमर नाथ झा)
देहली यूनिवर्सिटी

दीपावली पर दोहे

दीपावली शब्द की उत्पत्ति संस्कृत के दो शब्दों ‘दीप’ अर्थात ‘दिया’ व ‘आवली’ अर्थात ‘लाइन’ या ‘श्रृंखला’ के मिश्रण से हुई है। कुछ लोग “दीपावली” तो कुछ “दिपावली” ; वही कुछ लोग “दिवाली” तो कुछ लोग “दीवाली” का प्रयोग करते है । स्थानिक प्रयोग दिवारी है और ‘दिपाली’-‘दीपालि’ भी।

Poem on Diwali in Hindi

डॉ सुशील शर्मा के दोहे

नई ज्योति के पंख हों ,ज्योतिर्मय हर द्वार।
तिमिर न अब बाकी बचे ,नेह भरा संसार।

आज अमावस रात है ,तिमिर हँसे चहुँओर।
एक दीप जब जल उठा ,उजियाले हर छोर।

दीप पंक्तियाँ लग गईं ,घर में हुई उजास।
ज्योति शिखाओं से झरा ,हर मन में विश्वास।

अँधियारी मावस हँसे ,तमस लिए आधार।
रश्मिकिरण लेकर चलीं ,खुशियों की बौछार।

लिए वर्तिका प्रेम की ,विश्वासों का तेल।
दीपोत्सव में हो गया ,मन से मन का मेल।

नन्ही ज्योति जल रही ,लिए चुनौती हाथ।
अन्धकार के राज में ,किसका होगा साथ ?

दीपों से अब कीजिये ,यामा का शृंगार।
वसुधा को जगमग करे ,दीपों का त्यौहार।

दीवाली देती हमें ,नेह प्रेम सन्देश।
मन से मन को जोड़ती ,स्वच्छ बना परिवेश।

अन्धकार के राज में ,ज्योति बनी उम्मीद।
एक दीप उस द्वार पर ,सोता जहाँ शहीद।

मिट्टी के दीये बना ,सोचा करे कुम्हार।
काश आज दीपावली ,आये उसके द्वार।

डॉ सुशील शर्मा

बाबू लाल शर्मा के दोहे

*दीपक* एक  जलाइये, तन  माटी  का  मान।
मन की करिये वर्तिका, ज्योति जलाएँ ज्ञान।।

*पावन* मन त्यौहार हो, तम को  करना भेद।
श्रम करिये  कारज सधे, बहे तनों से  स्वेद।।

*वतन*  हमारा  है सखे, मनुज रहे सम भ्रात।
सबका  सुख त्यौहार हो, सद्भावी  हो बात।।

*लीप* पोत अपने भवन, करना शुभ परिवेश।
गली,गाँव से प्रांत फिर,स्वच्छ बने सब देश।।

शुभ सबको  *दीपावली*, फैले ज्ञान प्रकाश।
शुद्ध रहे  मन भावना, करिये  देश विकास।।

बाबू लाल शर्मा,बौहरा
सिकंदरा, दौसा,राजस्थान

दिवाली पर छोटी कविता

नूतन दीपावली


सत्तर पार का एक जोड़ा,
पुश्तैनी कला से जुडा ।

मिट्टी के गोले को आकार देता,

कांपते हाथों से चाक को थामता,

दियों को सजाकर जामा पहनाता,
देखकर अपनी कला को मुसकाता,

जगमग दीपावली के सपने संजोता,
दियों से जगमगाते हमारे घर ऑगन,
तभी बनता उनके चूल्हों में भोजन,
हम कहते दिवाली आई,दिवाली आई,
पीड़ा देखो उनकी, जिसने _
हमारे घर रोशनी फैलाई।

करो न तुम उनसे मोल भाव,
इनके जीवन में है कितने अभाव?

तुम इनके घर ऑगन रोशनी फैलाओ ,
अपने को कृतार्थ बनाओ।

माला पहल ‘मुंबई ‘

दीये की अभिलाषा

मैं दीया हूँ
अंधकार मिटाना
चाहता हूँ
प्रकाश फैलाना
चाहता हूँ
तूफानों से
जूझ रहा हूँ
कभी जल
कभी बुझ रहा हूँ
तेल है काफी
बात्ती भी है
तेज हवाएँ
सताती भी हैं
मुझे बुझाना
चाहती भी हैं
मुझे खूब
फङफङाती भी हैं
लेकिन मैं
जलना चाहता हूँ
सारा अंधकार
निगलना चाहता हूँ

-विनोद सिल्ला

यह दीया बुझे नहीं

घोर अंधकार हो

चल रही बयार हो

आज द्वार-द्वार पर यह दीया बुझे नहीं,

यह निशीथ का दीया ला रहा विहान है।

शक्ति का दिया हुआ

शक्ति को दिया हुआ

भक्ति से दिया हुआ

जोर का बहाव हो

यह स्वतंत्रता- दीया

रुक रही न नाव हो

आज गंग धार पर यह दीया बुझे नहीं,

यह स्वदेश का दीया प्राण के समान है।

यह अतीत कल्पना

यह विनीत प्रार्थना

यह पुनीत भावना

यह अनंत साधना

शांति हो, अशांति हो

युद्ध, संधि, क्रांति हो

तीर पर, कगार पर यह दीया बुझे नहीं,

देश पर, समाज पर, ज्योति का वितान है।

तीन-चार फूल हैं

आस-पास धूल है

बाँस है, बबूल है

घास के दुकूल हैं

वायु भी हिलोर दे

फूँक दे चकोर दे

कब्र पर, मजार पर यह दीया बुझे नहीं,

यह किसी शहीद का पुण्य प्राण-दान है।

झूम-झूम बदलियाँ

चूम-चूम बिजलियाँ

आँधियाँ उठा रहीं

हलचलें मचा रहीं

लड़ रहा स्वदेश हो

यातना विशेष हो

क्षुद्र जीत-हार पर यह दीया बुझे नहीं,

यह स्वतंत्र भावना का स्वतंत्र गान है।

● गोपाल सिंह नेपाली

प्राण का दीपक जला

● डॉ. देवेन्द्र आर्य


हो सकें तो प्राण का दीपक जला अँधियार में,

यह कुहासा, यह अँधेरा चार पल का भी नहीं।

हो गया मौसम भयावह

आज फिर गगनांत का,

हो गई प्रतिकूल

जो अनुकूल थी आँधी कभी।

“धार से अब क्या कहें,

मझधार से जो मिल गई।

आस जिससे नाव ने,

पतवार -सी बाँधी कभी।

दिग्भ्रमित कल के लिए आगत न आहत हो यहाँ,

यह कुहासा यह अँधेरा चार पल का भी नहीं।

जानकर भी आज तक

कितना सँवारा आज को ?

हर व्यवस्था हाथ में लें

खड़े थे द्वार पर,

पीढ़ियों का रोष, यह आक्रोश

जब उगने लगा

क्यों न हमने जीत लिख दी

हार के हर छोर पर ?

हो सकें तो हर सृजन को दो नई युग चेतना,

यह कुहासा, यह अँधेरा चार पल का भी नहीं।

हारने थकने ठहरने से

भला मंजिल कहाँ ?

आज भी लेकर चलो

उस भोर को कल के लिए,

हर सफर में मुश्किलें

तो मुश्किलों की बात क्या ?

जय कदम के साथ हो

विश्वास हर पल के लिए।

यूँ समय की धार में तिनके सरीखे मत बहो,

ज्वार-भाटा, यह अँधेरा चार पल का भी नहीं ।

दिवाली पर छोटी सी कहानी

श्यामू की दीवाली

श्यामू एक गरीब लड़का है।वह  उसकी मां का एक मात्र सहारा भी। श्यामू की मां पड़ोस के घर में झाड़ू पोछा  लगाती थी । उसकी गरीबी की हालत से श्यामू अच्छी तरह से वाकिफ था।
श्यामू को दीपावली त्यौहार बहुत पसंद था ।

जब दीपावली त्यौहार का समय नजदीक आया तो वह बहुत खुश था । इसका मतलब यह कतई नहीं है कि उसे औरों की तरह ढेर सारे पटाखे , मिठाई और नए कपड़े का मिलने वाले थे।
दीपावली के रात जब पड़ोस में धूमधाम से पटाखे चलाए जा रहे थे ,तो वह उछलता कूदता वहां पर पहुंच गया। जब पटाखे जलते तो वह खुशी से नाचता। उसकी खुशी , पड़ोसी के बच्चों के खुशी पर भारी पड़ रहा था।  यह नजारा देखकर श्यामू की मां की आंखों में सुखदुख से मिश्रित आंसू आ गए ।

श्यामू की मां की दीपावली श्यामू की खुशी ही थी और उसका दीपक उसका बेटा श्यामू, जो उसके जीवन को प्रकाशित कर रहा था।

( लेखक:- मनीभाई)

दीपावली पर सायरी

सच्चाई की जीत लिए ।
खुशियों की जीत लिए ।
जलते हैं यह दिये ,
दीपावली के लिए ।


दुनिया की Darkness, Light  हो ।
हर जगह freshness bright  हो ।
और लाइट हो रोशनी से जिये।
जलते हैं यह दिये…..


प्रकाश बंट कर भी कम नहीं होती
यह जीने का मतलब है ।
प्रसाद बांट कर भी कम नहीं होती
यही जीने का मतलब है ।
हर चीज मिल बांट कर खाएं
जलती दीपक हमको यही बताए
जान ले प्रिये मान ले प्रिये
जलते हैं यह दिये…..


तेरी आंगन कभी सुनी ना हो ।
तेरी उन्नति दिन रात चौगुनी हो ।
लक्ष्मी मां की तुझ पर हो कृपा
रहे ना कभी तुझ पर वह खफा ।
अबकी दिवाली तेरे जख्मों को सीये।
जलते हैं यह दिये …..

-मनीभाई ‘नवरत्न’

दीपावली त्योहार पर निबंध

कार्तिक की अमावस्या को होने वाला यह पर्व है, जिस संध्या समय अमावस्या का होना आवश्यक है। लक्ष्मी पूजन भी इसी दिन होता है। अमावस्या यदि दो दिन पड़े तो दूसरे दिन दीवाली होगी। यदि प्रदोष में (संध्या को सूर्यास्त के पश्चात् – रजनीमुख मैं) अमावस्या पड़े ही नहीं तो पहले दिन लक्ष्मीपूजा और दूसरे दिन दीपदान होता है। पहले इसे ‘दियेवाली’ अमावस्या कहते थे। दियेवाली का ही संक्षिप्त रूप दीवाली है। अब दीपदान और तर्पण तो शायद ही कोई करता हो, हाँ रात-दिन जुआ अवश्य खेलते हैं जिसे आगामी साल की हारजीत का शकुन मानते हैं।

युग-युग से हम दीपोत्सव मनाते आये हैं। यह शरद ऋतु के उत्तरार्द्ध और हेमन्त के आरम्भ में कार्तिक अमावस्या को मनायी जाती है। वर्षा ऋतु के समाप्त होने पर दीवाली आती है। बरसात के कारण सड़े गले पदार्थों से सारा वायुमंडल विषाक्त हो उठता है। नाना प्रकार के कीड़े-मकोड़े बरसात में उत्पन्न हो जाते हैं जो भिन्न-भिन्न रोगों को फैलाने वाले होते. हैं। दीपावली में घरों को लीप-पोतकर साफ किया जाता है। हवन और दियों के कारण वे पतंगें मर जाते हैं और रोग की आशंका भी मिट जाती है। वर्षा के पश्चात् किसानों का घर अन्न से भरा रहता है तथा व्यवसायियों के व्यवसाय मार्ग खुल जाते हैं इसलिए ये लोग विशेषकर हर्षोल्लास प्रकट करते हैं।

पौराणिक आधार पर किसी राजा की एक मोती की माला कौआ लेकर भाग गया जिसे एक गरीब ब्राह्मण ने पाया। पुरस्कार के लोभ से राजा को माला दें उसने राजा से यह कहा कि कार्तिक अमावस्या को उसका घर छोड़ कहीं दिया न जलाया जाए। लक्ष्मी ने प्रसन्न होकर ब्राह्मण को धन-धान्य से परिपूर्ण कर दिया। तभी से यह तिथि लक्ष्मी के आगमन की सूचक मानी जाती है।

दूसरी कथा राजा बलि के बारे में है। देवराज इन्द्र का सिंहासन प्राप्त करने की बलि की अनधिकार चेष्टा से रूष्ट हो भगवान विष्णु ने वामन अवतार ले राजा बलि का सारा राज्य ले लिया और उसे नरक में भेज दिया। कुछ दिनों उपरान्त उसके पूर्वजन्म के कर्मों से प्रसन्न हो विष्णु ने कार्तिक की अमावस्या को ही राजा बलि का राज्य उसे वापस कर दिया था। इसी की स्मृति में यह पर्व मनाया जाता है।

भगवान रामचन्द्र का राज्याभिषेकोत्सव, विजितेन्द्रिय हनुमान का जन्म, स्वामी दयानन्द की मृत्यु, परमहंस रामतीर्थ की ब्रह्मलीनता, इसी अवसर पर हुई थी। जैन ग्रंथों के अनुसार महावीर स्वामी का निर्वाण भी इसी तिथि को हुआ था।

धनतेरस से आरंभ कर ‘भैया दूज’ तक यह पर्व मनाया जाता है। धनतेरस के दिन अश के ढेर पर द्वार देश में दिया प्रज्ज्वलित किया जाता । धनतेरस के दिन पितृलोक के देवता यम की पूजा होती है और धन के दरवाजे पर यम का दिया जलाया जाता है। पुराण अनुसार इस दिन हमारे पुरखे यमलोक से हमसे भेंट करने के लिये पृथ्वी पर आते हैं। इसी से उल्कादान का महत्व है। दूसरे दिन को नरक चतुर्थी कहते हैं जिस दिन श्रीकृष्ण ने अपनी रानी सत्यभामा की सहायता से अत्याचारी नरकासुर का वध किया था जिसने 16000 राजकन्याएँ कारागार में डाल रखी थीं।

सनत्कुमार संहिता के अनुसार तीसरा दिन महालक्ष्मी की उपासना का है।दीपमालिका के दूसरे दिन अन्नकूट होता है। इस दिन पार्वतीजी ने शंकर को द्यूतक्रीड़ा सिखलायी थी। इसलिए इस दिन जुआ खेलते हैं। इसी दिन अन्नकूट (जो वास्तव में गोवर्धन पूजा का ही समारोह है) और गोवर्धन पूजा होती है। दीपावली के दूसरे दिन को ” द्यूतप्रतिपदा” कहते हैं जिस दिन रात भर जागे रहने का विधान है। इस तिथि को प्रभात काल में जुआ खेलना अनिवार्य माना गया है। यों तो ऋग्वेद, अथर्ववेद, ब्राह्मणग्रंथ, रामायण, महाभारत तथा अनेक अन्य पुरान ग्रन्थों में द्यूत के अस्तित्व तथा उसकी चर्चा हुई है।

भ्रातृ द्वितीया इस उत्सव का अंतिम दिन है जब बहिन भाई के आरोग्य तथा प्रसन्न रहने के लिए आराधना करती है और भाई के टीका लगाती है। इस दिन यमराज अपनी बहन यमुना के घर आकर भोजन करते हैं। बहिन के घर भाई के खाने का विधान है। इस प्रकार दीपावली मनाने के अनेक कारण हैं जिनमें अधिकांश हिन्दू राम के अयोध्यागमन को ही मानते हैं।

दीपावली का पर्व हर्षोल्लास का दिन है। इन दिनों में अवकाश रहता है, अतः पर्व के पूर्व अथवा पश्चात् विद्यालय में इस पर्व के विषय में सम्पूर्ण जानकारी देते हुए सभा का आयोजन करना चाहिए। इसमें छात्रों की अधिकाधिक सहभागिता हो, ताकि उनमें आत्मविश्वास एवं अभिव्यक्ति की क्षमता आ सके।

भारतीय संस्कृति में मिट्टी के जलते हुए दीपक का बहुत महत्व है। अज्ञान अंधेरे जैसा होता है और ज्ञान प्रकाश जैसा। दीपक अंधेरा मिटाता है, प्रकाश देता है। मिट्टी का बना दीपक, मिट्टी से बने मनुष्य शरीर का प्रतीक है। उसमें जलता तेल हमारी जीवन-शक्ति का प्रतीक है। तिल-तिल जलकर दीपक प्रकाश देता है जिससे अंधेरा दूर होता है। इसी प्रकार मानव कर्त्तव्य है कि अज्ञान का अंधेरा कम करे और ज्ञान का प्रकाश फैलाए यह दीपक का संदेश है।

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