कुछ तो स्टैंडर्ड बनाओ
समाज और यथार्थयह कविता आधुनिक समाज की सोच, जीवन-शैली और दिखावटी प्रगति पर तीखा, व्यंग्यात्मक और विचारोत्तेजक प्रहार है। कवि आज के व्यक्ति को आईना दिखाता है, जो तकनीक, ट्रेंड और तथाकथित सफलता में उलझकर जीवन के मूल अर्थ से दूर होता जा रहा है।
कुछ तो स्टैंडर्ड बनाओ Read More »











