महावीर स्वामी — मनीभाई नवरत्न
भारत की आध्यात्मिक धरती पर
जब अहिंसा की रोशनी मंद पड़ रही थी,
जब जीवन की पीड़ा को
कोई स्थिर मार्ग नहीं मिलता था—
तब एक दिव्य स्वर प्रकट हुआ,
जिसने कहा—
“शांति बाहर नहीं, अपने भीतर से उपजती है।”
वही स्वर बने—
महावीर स्वामी।
599 ईसा पूर्व की वह सुबह,
कुण्डग्राम की धरती
एक असाधारण आत्मा का स्वागत कर रही थी।
त्रिशला के हृदय की प्रार्थना,
सिद्धार्थ के कुल की मर्यादा—
सब एक नव जन्म में सिमट आए थे।
राज्य का वैभव था,
पर बालक महावीर का मन
मोह से नहीं,
एक गहरी करुणा से भरा था।
राजमहल की दीवारें
उनके मौन धैर्य को रोक न सकीं।
उनकी आँखों में
भोग नहीं—
त्याग का उजाला था।
उन्होंने संसार के शोर को छोड़ा,
वन की नीरवता को अपनाया,
बारह वर्षों तक
सहन किए तप के दृश्य,
सहन किए शरीर के घाव,
पर आत्मा की ज्योति
और उजली होती गई।
इन्द्रियों पर विजय पाई—
और वे ‘जिन’ कहलाए।
उनकी सरलता में गहराई थी,
आचरण में दृढ़ता थी,
और विचारों में
मानवता का विशाल आकाश।
जब ज्ञान का प्रकाश पूर्ण हुआ,
तो महावीर चल पड़े—
देशाटन की लम्बी यात्रा पर।
मगध, मिथिला, कलिंग, कौशल—
हर भूमि ने उनके वचनों में
शांति की अनुभूति पाई।
उन्होंने कहा—
“जीव, चाहे छोटा हो या बड़ा—
उसमें जीवन है।
हिंसा नहीं, दया ही मार्ग है।”
अहिंसा, सत्य, अयाचार,
ब्रह्मचर्य और अपरिग्रह—
ये पाँच दीपक
उन्होंने समवसरण में जलाए,
और मनुष्यों को
अपनी आत्मा का पथ दिखाया।
उनकी वाणी में ऐसा प्रभाव था
कि लाखों हृदय
जैन धर्म की शरण आए—
मुनि, आर्यिका, श्रावक और श्राविका
बने उनके विस्तृत परिवार।
स्त्री-पुरुष का समान स्थान—
यह उनकी करुणा की पहचान थी।
राजकुमारी चंदना
जब आर्यिका बनी,
तो धर्म का दीप
और दूर तक दिखाई देने लगा।
92 वर्ष का जीवन,
त्याग, तप और सत्य का पुलिंद।
पावा नगरी के कमल सरोवर के पास
जब उनका निर्वाण हुआ,
तो मानो प्रकृति ने
अहिंसा की एक ज्योति को
अनंत आकाश में भेज दिया।
जैनों ने उसी रात
दीपक जलाए—
और दीपावली
एक आध्यात्मिक उत्सव बन गई।
महावीर आज भी जीवित हैं—
हर उस विचार में
जो हिंसा से दूर है,
हर उस मन में
जो आत्म-ज्ञान की ओर चलता है।
वह केवल धर्म प्रवर्तक नहीं—
मानवता के
अंतरतम में जलता
एक शांत,
अचल,
अनंत प्रकाश हैं।
— मनीभाई नवरत्न
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